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अ॒मेव॑ नः सुहवा॒ऽआ हि गन्त॑न॒ नि ब॒र्हिषि॑ सदतना॒ रणि॑ष्टन। अथा॑ मदस्व जुजुषा॒णो ऽअन्ध॑स॒स्त्वष्ट॑र्दे॒वेभि॒र्जनि॑भिः सु॒मद्ग॑णः ॥२४ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒मेवेत्य॒माऽइ॑व। नः॒। सु॒ह॒वा॒ऽइति॑ सुऽहवाः। आ। हि। गन्त॑न। नि। ब॒र्हिषि॑। स॒द॒त॒न॒। रणि॑ष्टन। अथ॑। म॒द॒स्व॒। जु॒जु॒षा॒णः। अन्ध॑सः। त्वष्टः॑। दे॒वेभिः॑। जनि॑भि॒रिति॒ जनि॑ऽभिः। सु॒मद्ग॑ण॒ इति॑ सु॒मत्ऽग॑णः ॥२४ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:26» मन्त्र:24


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (त्वष्टः) तेजस्वि विद्वन् ! (जुजुषाणः) प्रसन्नचित्त गुरु आदि की सेवा करते हुए (सुमद्गणः) सुन्दर प्रसन्न मण्डलीवाले आप (देवेभिः) उत्तम गुणवाले (जनिभिः) जन्मों के साथ (अन्धसः) अन्नादि उत्तम पदार्थों की प्राप्ति में (मदस्व) आनन्दित हूजिये (अथ) इस के अनन्तर (अमेव) उत्तम घर के तुल्य औरों को आनन्दित कीजिये। हे विद्वान् लोगो ! (सुहवाः) सुन्दर प्रकार बुलाने हारे तुम लोग उत्तम घर के समान (बर्हिषि) उत्तम व्यवहार में (नः) हमको (आ, गन्तन) अच्छे प्रकार प्राप्त हूजिये। इस स्थान में (हि) निश्चित होकर (नि, सदतन) निरन्तर बैठिये और (रणिष्टन) अच्छा उपदेश कीजिए ॥२४ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो आप उत्तम व्यवहार में स्थित हो के औरों को स्थित करें, वे सदा आनन्दित हों। स्त्री-पुरुष उत्कण्ठा पूर्वक संयोग करके जिन सन्तानों को उत्पन्न करें, वे उत्तम गुणवाले होते हैं ॥२४ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

(अमेव) उत्तमं गृहमिव (नः) अस्मान् (सुहवाः) शोभनाह्वानाः (आ) (हि) किल (गन्तन) गच्छत (नि) नितराम् (बर्हिषि) उत्तमे व्यवहारे (सदतन) सीदत (रणिष्टन) वदत (अथ) अनन्तरम्। अत्र निपातस्य च [अ०६.३.१३६] इति दीर्घः। (मदस्व) आनन्द (जुजुषाणः) प्रसन्नः सेवमानः (अन्धसः) अन्नादेर्मध्ये (त्वष्टः) देदीप्यमानः (देवेभिः) दिव्यगुणैः (जनिभिः) जन्मभिः (सुमद्गणः) सुहर्षगणः ॥२४ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे त्वष्टो ! जुजुषाणः सुमद्गणाः संस्त्वं देवेभिर्जनिभिः सहाऽन्धसो मदस्वाथाऽमेवान्यानानन्दय। हे विद्वांसः ! सुहवा यूयममेव बर्हिषि न आ गन्तन। अत्र हि निषदतन रणिष्टन च ॥२४ ॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। ये स्वयमुत्तमे व्यवहारे स्थित्वाऽन्यान् स्थापयेयुस्ते सदाऽऽनन्देयुः। स्त्रीपुरुषाः प्रीत्या संयुज्य यान्यपत्यानि जनयेयुस्तानि दिव्यगुणानि जायन्ते ॥२४ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जे स्वतः उत्तम व्यवहार करतात व इतरांनाही करावयास लावतात ते नेहमी आनंदात राहतात. स्री-पुरुषांनी इच्छापूर्वक मिलन करून संतान उत्पन्न केल्यास ते उत्तम गुणांनी युक्त असतात.